हमलोग

हमलोग यहां आपका इंतजार कर रहे हैं….

अमेरिका के संसद में दीवाली

Posted by जोश राज on अक्टूबर 30, 2007

diwanli.jpgवाकई भले ही ये सांकेतिक हो, लेकिन ये भारतीयों और भारतीयता की बहुत बड़ी जीत है। अमरीकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने दीवाली के महत्व को मानने वाले एक प्रस्ताव को संपूर्ण बहुमत से पास किया है। हांलाकि भाले ही महज ये प्रस्ताव हो, लेकिन अमरीकh संसद में इसका पेश होना, इसके उपर चर्चा होना और फिर इसका पास होना, हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानी संस्कृति के बढ़ते महत्व की दास्तान है। रिपब्लिकन सांसद जो विल्सन ने इसे सदन में पेश किया और ये तीन सौ अट्ठावन वोटों से बिना किसी विरोध के पारित भी हो गया। समाचार एजेंसियों के अनुसार उन्होंने अपने एक बयान में कहा, ‘अमरीकी संसद ने पहली बार दीवाली के सम्मान में प्रस्ताव पारित किया है। मेरे प्रस्ताव में दीवाली के अंतराष्ट्रीय, धार्मिक और एतिहासिक महत्व को और भारत की धार्मक विविधता को स्वीकार किया है।

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तमीज़ की ऐसी की तैसी…

Posted by जोश राज on अक्टूबर 28, 2007

ये व्यथा कथा है, उस भद्र पुरूष की, जो हर रोज ब्लूलाइन बस का संघर्षों भरा सफर तय कर अपने ऑफिस पहुंचता है। चंद शब्दों के जरिए उस बेचारे भले मानस ने यहां अपना दर्द बयां करने की कोशिश की है। पेशे से एक न्यूज चैनल में बतौर लिक्खाड़ (Copy Editor)काम कर रहे इन महोदय के दर्द को आप भी महसूस करें, और मज़ा लें, क्योंकि इस शहर में एक की मजबूरी, दूसरे का मज़ा है। कुन्दन शशिराज

bluelinebus.jpgब्लूलाइन बस। आम आदमी के बुलबुले वाले गुस्से की वजह, और मीडिया के लिए सनसनीखेज़ ख़बर का सामान। राजधानी में हर वो आदमी, जिसके पास गाड़ी नहीं है, ब्लूलाइन बसों के रहमोकरम पर ज़िदगी की गाड़ी खींच रहा है। दूसरों के लिए ब्लूलाइन बस कुछ भी हो, लेकिन भाई अपने हिसाब से तो दिल्ली की नब्ज़ है ब्लूलाइन। ये अलग बात है, कि कुछ दिनों बाद दिल्ली की नब्ज़ मेट्रो हो जाएगी, तब की तब देखी जाएगी। फिलहाल तो ब्लूलाइन अपने भी दिल की धड़कन है। अगर ब्लूलाइन का सहारा न हो, तो अपने दिल की धड़कन ही बंद हो जाएगी। ब्लूलाइन नहीं होगी तो रोज दफ्तर कैसे जाएंगे। ऑटो से रोज रोज दफ्तर जाना कम से कम अपने बस की बात तो नहीं है। मिडिल क्लास में भी निचले दर्जे वाले जो ठहरे। इसका लब्बोलुबाव ये है कि अगर ब्लूलाइन नहीं होगी, तो नौकरी चली जाएगी। दाना पानी बंद हो जाएगा। रोटी रोटी को मोहताज हो जाएंगे। और गर्दन उंची करके बाबू बनकर घूमने का दम भी नहीं भर पाएंगे। यानि जिंदगी बिल्कुल खल्लास।

                                                                   अब तक आप भी मेरी इस बात से इत्तेफाक रखने लगे होंगे, कि ब्लूलाइन ही हम लोअर मिडिल क्लास वालों की जिंदगी की नब्ज़ है। ब्लू लाइन वाले, लोअर मिडिल क्लास वालों की इस मजबूरी को खूब समझते हैं। तभी तो हमारी मजबूरी का फायदा उठाकर वो तमीज की ऐसी की तैसी कर रहे हैं। इसका एहसास आपको ब्लूलाइन में कदम रखते ही हो जाता होगा। जब स्लेटी वर्दी पहने एक हट्टा कट्टा इंसान आपकी सीट पर पहुंचता है, और आपसे टिकट के लिए पूछता है। उस लम्हे ज़रा उसके लहज़े पर गौर फरमाइए। कंडक्टर, ‘अरे ..कित जाएगा’। उसके मुंह से निकले ये शब्द आपको तीर की तरह चुभते हैं, और एक ही झटके में आपकी साहबगिरी का गुमान ज़मीन पर आकर चकनाचूर हो जाता है। कंडक्टर ये अल्फाज़ कुछ इस अंदाज़ में कहता है, मानो मन ही मन आपके कीमती कपड़े, सूट टाई, मंहगे जूतों का मजाक उड़ा रहा हो। आपको बुरा लग सकता है, लेकिन कुछ कर नहीं पायेंगें। करेंगें तो फंसेंगें। मन की गालियां बाहर निकाली, तो मामला बढ़ सकता है। धक्का मुक्की हो सकती है, और नौबत मारपीट तक भी पहुंच सकती है। अब बताने की जरूरत नहीं कि पिटेगा कौन.. और पीटेगा कौन । अगर ऐसा हुआ तो आगे का सफर मुश्किल भरा हो सकता है। थाना कचहरी …ज़ेहन में कोर्ट कचहरी का नाम कौंधते ही आपकी हिम्मत जवाब दे जाती है, और वक्त की नज़ाकत भांपते हुए बगैर प्रतिकार के आप खामोशी से कंडक्टर साहब को उनका किराया सौंप देते हैं।

                                                लेकिन आपकी बदकि़स्मती यहीं खत्म नहीं होती। आपको पांच रूपये वाला टिकट खरीदना है, लेकिन आपने थमा दिया पचास का नोट। बेशक आपको पता नहीं होगा, लेकिन इसी मासूमियत में आपने एक गुनाह और कर दिया। अब अगर कंडक्टर आपको मुजरिम मानकर घूरता है, तो इसमें उस भले आदमी की क्या ख़ता है। आपने गुनाह ही इतना बड़ा कर दिया। सुबह का वक्त है, बेचारा अभी बोहनी को निकला है, और आपने शहंशाहेआलम पनाह की मानिंद पचास का इतना बड़ा नोट उसके सामने रखा दिया। आखिर कहां से वो बेचारा छुट्टे लाएगा। आपने एक बार फिर कंडक्टर महोदय को गुस्सा दिला दिया। अब खाइए एक बार फिर से कंडक्टर साहब से घुड़कियां। सच्ची, इस बार की घुड़कियां सुनकर तो किसी भी भले आदमी का दिमाग गर्म हो जाएगा। आखिर पैसे भी दें, और घुड़कियां भी सुनें। दिल करता है कि इस बद्दिमाग कंडक्टर के कान के नीचे एक जोरदार कंटाप जड़ दें। लेकिन आप बेबस हैं। इसलिए सिर्फ ना – नूं करके चुप होना पड़ता है। ब्लूलाइन में सफर करते वक्त ऐसे हालात से आप एक नहीं कई दफा, दो चार होते होंगें। भाषा, तमीज़, तहजी़ब, संस्कार, सभ्यता जैसे भारी भरकम अल्फाज़ उस लम्हे आपको बेकार लगने लगते हैं। आप, आइए, जाइए, खाइए, सुनिए सुनाइए, सरीखे शब्द आत्मा पर बोझ लगने लगते हैं। अगर आप बिहार या उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाकों से ताल्लुक रखते हैं, तब तो कहने ही क्या ? आपकी इच्छा होगी कि अभी धरती फटे और उसमें समा जाएं। आखिर, आप उस जगह से आए हैं, जहां गालियां भी बड़े सम्मान के साथ दी जाती हैं।

                  लेकिन महोदय अगर आपको दिल्ली में सर्वाइव करना है, तो ब्लूलाइन बसों के स्टाफ की दादागिरी तो आपको झेलनी ही पड़ेगी। तरक्की और दौलत की ख्वाहिश के लिए आपको ये कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। लेकिन इस आत्मसम्मान का क्या करें, जो बाइस साल तक स्कूल कॉलेजों में पोथियां पढ़ पढ़ के जमा की हैं। ऐसे में फ्रस्टेशन होना लाजमी है। फिर क्या करें ? फ्रस्ट्रेशन से बचने के लिए बेहतर है कि इसे आप दिनचर्या कk हिस्सा मान लें। इन बर्तावों को कभी अपने दिल पर न लें। और हां …अपना गुस्सा बस वालों पर तो कतई न उतारें। आराम से घर जाएं। बीवी बच्चों की ख़ामियां ढूंढे, और उन पर जी भर के गुस्से का इज़हार करें। इससे आपको दो फायदे होंगें। एक तो, वहां गुबार निकालने पर आपका सम्मान बना रहेगा। दूसरे आपके दिल का बोझ भी हल्का हो जाएगा। आखि़र आपको ब्लूलाइन में रोज सफर करना है, और पानी में रहकर मगरमच्छ से तो बैर नहीं किया जा सकता। इसिलए राजधानी में सुखपूर्वक रहना है, तो अपनी भाषा, अपना ज्ञान, अपनी तहज़ीब और तमीज को अपने गांव या शहर जहां से भी आप आए हैं, वहीं छोड़ दीजिए। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। भगवान आपका भला करें….।

मनोज वशिष्ठ

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स्मृति शेष…

Posted by जोश राज on अक्टूबर 26, 2007

मां का अंक वह किलकता बचपन
हमने खोया है
तितली के हों रंग बिरंगें पंख
या फिर पंखुड़ियों सा कोमल मन
हमने खोया है
दादी के लोरी की थाती है
चांद सलोना

तुतलाती भाषा में स्नेह सिखाती
नन्ही बहना

गुल्ली डंडा और लच्ची डानी में
दिनचर्या का ठप होना
माटी में धुरियाआ हुआ सुवासित तन
हमने खोया है
खेलों में परियों का
किस्सों में गुड्डे गुडियों का
रचा बसा हुआ संसार
बूढ़े बाबा की गीली आखों में
भावी जीवन का सार
मेंहदी, बेला, रजनीगंधा मेरे आंगन
हरसिंगार और सोनजुही से महका उपवन
हमने खोया है
है प्रश्नों का अंबार जहां
है गति का विस्तार जहां
रूठे तो बहलावे हैं
रोने पर है दुलार जहां
स्मृतियों का ऐसा पसरा जीवन
हमने खोया है…..

                                     संदीप सिंह

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सांस से सिला हुआ लिबास फूंक दे…

Posted by जोश राज on अक्टूबर 24, 2007

gulazar.jpgवाह गुलज़ार साहब की क्या बात है…! उनकी रचनाओं पर अपनी राय रखने वाला मैं कौन होता हूं..। लेकिन कभी कभी अपने आपको किसी की तारीफ करने से रोकना नामुमकिन सा हो जाता है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ, जब मैनें पिछले दिनों नो स्मोकिंग का गुलज़ार साहब का लिखा एक गाना सुना। वाह़ क्या बोल थे…

                      फूंक ….फूंक…. फूंक फूंक दे ….

                      हयात फूंक दे…
                      हवा से फूंक दे
                       सांस से सिला हुआ लिबास फूंक दे

                       फूंक ….फूंक…. फूंक फूंक दे ….

गाने के बोल सरल तो थे ही , इतने गंभीर भी थे कि हम जैसे नशाखोरों को भी एक बार सोचने को मजबूर कर गए कि हम आखिर ये अपने जिस्म के साथ क्या कर रहे हैं.? गुलज़ार साहब का गाना तो शानदार था ही, उपर से इसे जिस अंदाज़ में गाया गया था, वो भी कमाल का था। इस गाने को अपनी मदहोश करने वाली आवाज़ दी है, रेखा rekha.jpg भारद्वाज ने। वही रेखा भारद्वाज जिन्होनें ओमकारा का हिट सांग नमक इस्क का गाकर तहलका सा मचा दिया था। लेकिन रेखा भारद्वाज का परिचय बस इतना सा ही नहीं है। वो मशहूर निर्देशक विशाल भारद्वाज की पत्नी हैं, और विशाल ने ही उन्हें अपनी फिल्म ओमकारा में पहली बार ये गाना गाने का मौका दिया था। इसमें कोई शक नहीं  कि इस गाने को रेखा से बेहतर और कोई नहीं गा सकता था। वाकई कहना पड़ेगा एक प्रतिभाशाली निर्देशक कीvishal.jpg प्रतिभाशाली गायिका पत्नी।

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आर जे अनिरुद्ध को अपनी सीमाएं समझनीं चाहिए….

Posted by जोश राज on अक्टूबर 18, 2007

on-air.jpgon-air.jpgon-air.jpgअभी पिछले सोमवार की ही बात है। रात के तकरीबन डेढ. बज रहे थे, निंदिया रानी रूठी पडी थी, तो उन्हें बुलाने के लिए मैनें सोचा चलो रेडियो की लोरी ही सुन ली जाए। अपना मोबाइल रेडियो आन किया, तो कोई अनिरूद्ध एल एल बी महोदय अपनी खुद की आवाज पर ही मुग्ध से बतियाए जा रहे थे। बातचीत का विषय सुन हम भी एक बार को चैनेल चेंज करते करते रूक गए। साब बता रहे थे कि नवरात्र के समय घर से बाहर निकलने वाले युवक युवतियां कुछ और साथ लेकर चले न चलें, कॉन्डॉम जरूर अपने साथ रखें। इसके पीछे उनका बडा सुलझा हुआ सा तर्क ये था कि नवरात्र पर्व ही ऐसा है, कि पता नहीं कब मूड बन जाए, तो सावधानी में ही सुरक्षा वाले मंत्र के तहत कॉन्डॉम लेकर चलने में ही समझदारी है। और तॉ और  साहब बीच बीच में फोनलाइन पर कुछ कन्याओं से बतियाते भी जा रहे थे, और अपनी समझदारी भरी बातों से सबको कन्वींस भी किए जा रहे थे।

                                                            एक बार तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं अमेरिका या किसी पश्चिमी देश का कोई एफ एम चैनेल सुन रहा हूं, जहां बड़ी ही बेशर्मी से इस तरह की बातें की जा रही हैं। मुझे मालूम है कि मेरी इन बातों से मुझे पिछड़ा हुआ समझा जा सकता है। सेक्स एजुकेशन और हेल्थ अवेयरनेस की बात कह कर मेरा मुंह बंद करने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन इन बातों से मुझे कोई सरोकार नहीं है। मैं कोई आर एस एस या बजरंग दल का कार्यकर्ता नहीं हूं, लेकिन एक गर्वित हिंदुस्तानी हूं, और मुझे अपनी पांच हजार साल पुरानी संस्कृति पर बहुत गर्व है।

                                                               सेक्स शायद सभी के जीवन का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम उसे बेडरूम से उठाकर सड़क पर ले आएं। सेक्स एजुकेशन और हेल्थ अवेयरनेस का मतलब नवरात्र में कॉन्डाम के इस्तेमाल पर चटखारे भरी चर्चा नहीं है। अगर सेक्स एजुकेशन पर बात करनी ही है, अवेयरनेस ही बढ़ानी है, तो महोदय उसके लिए और भी कई गंभीर तरीके हैं। उन्हें अपनाइए, सस्ती और छिछोरी लोकपि्रयता हासिल करने के लिए नवरात्र ( जो कि कईयों के लिए घोर आस्था का समय होता है, वैसे मैं घोर नास्तिक हूं ) के वक्त ऐसी चर्चाओं से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

                                             अनिरूद्ध और उन जैसे ही और बुदि्धजीवियां को मेरी सलाह है कि अगर वो सेक्स एजुकेशन और हेल्थ अवेयरनेस पर सार्थक कार्यक्रमों को देखाकर कुछ सीखना चाहते हैं, तो बीबीसी और दूरदर्शन द्वरा बनाए कार्यक्रम जासूस विजय और हाथ से हाथ मिला कभी फुरसत निकाल कर देख लें।

वक्त कम है………वैसे कहने के लिए तो और भी बहुत कुछ था

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प्रथम पृष्ठ….

Posted by जोश राज on सितम्बर 23, 2007

जला अस्थियां बारी-बारी
छिटकाईं जिनने चिनगारी
जो चढ़ गये पुण्य वेदी पर
लिये बिना गरदन का मोल
कलम आज उनकी जय बोल।

जो अगनित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे
जल-जलकर बूझ गये किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही है लपट दिशाएं
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा
जाने क्या इतिहास बेचारा
साखी हैं जिनकी महिमा के
चन्द्र, सूर्य, भूगोल, खगोल
कलम आज उनकी जय बोल।

Ramdhari Singh Dinkar

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